Friday, December 9, 2022
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सूरदास का जीवन परिचय | Surdas Ka Jivan Parichay

सूरदास का जीवन परिचय | Surdas Ka Jivan Parichay

सूरदास भक्ति-काव्य की सगुण धारा की कृष्ण भक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं। ऐसा माना जाता है कि इनका जन्म आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर स्थित रुनकता में सन् 1478 ई. में हुआ था। इनके जन्म को लेकर बहुत मत भेद है, इसलिए जन्म की पुष्टि सही से नही हो पाई है, कुछ विद्वान् का मानना है की इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम में मानते हैं। पं. रामदास सारस्वत इनके पिता का नाम था। ऐसा कहा जाता है कि सूरदास जन्म से ही अन्धे थे।
विद्वानों का कहना है कि बाल-मनोवृत्तियों एवं चेष्टाओं का जैसा सूक्ष्म वर्णन सूरदास जी ने किया है, वैसा वर्णन कोई जन्मान्ध व्यक्ति कर ही नहीं सकता, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि वे सम्भवतः बाद में अन्धे हुए होंगे।

सूरदास की कृतियॉं:

सूरसागर, सूरसारावली, साहित्‍य-लहरी, सूर पच्‍चीसी, नाग लीला, पद संग्रह, गोवर्धन लीला

भक्त शिरोमणि सूरदास जी ने लगभग सवा लाख पदों की रचना की थी, जिनमें से केवल आठ से दस हजार पद ही प्राप्त हो पाए हैं। ‘काशी नागरी प्रचारिणी सभा’ के पुस्तकालय में ये रचनाएँ सुरक्षित हैं। पुस्तकालय में सुरक्षित रचनाओं के आधार पर सूरदास जी के ग्रन्थों की संख्या 25 मानी जाती है, किन्तु इनके तीन ग्रन्थ ही उपलब्ध हुए हैं, जो नीचे दी गयी हैं:-
सूरसागर: यह सूरदास जी की एकमात्र प्रामाणिक कृति है। इसमें कृष्ण की बाल-लीलाओं, गोपी-प्रेम, गोपी-विरह, उद्धद गोपी संवा T बड़ा मनोवैज्ञानिक और सरस वर्णन है।
सूरसारावली: यह भी सूरदास जी की एक प्रामाणिक कृति है। इसमें 1107 पद हैं।
साहित्य लहरी: इस ग्रन्थ में 118 दृष्टकूट पदों का संग्रह है कहीं-कहीं श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन तथा एक-दो स्थलों पर ‘महाभारत’ की कथा के अंशों की झलक भी दिखाई देती है।

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काव्य रचनाओं की विशेषताएं

भाव पक्ष एवं कला पक्ष

सूरदास जी की रचनाओं में भक्ति रस के साथ श्रृंगार रस का भी उपयोग देखने को मिलता है। इन दोनों में वर्णित छंद और पद अत्यंत ही दुर्लभ हैं।
सूरदास की रचनाओं में छंद पदों का उपयोग हुआ है।
सूरदास जी की रचनाओं में भावानुकूल शब्द-चयन , सार्थक अलंकार , भाषा की सजीवता आदि को बहुत ही अच्छे तरीके से निरूपित किया है।
सूरदास ने अपने कविताओं और दोहों में श्री कृष्ण भगवान जी माता यशोदा मां के शील , शीतल गुणों को बहुत अच्छी तरह से चित्रित किया है।
सूरदास जी ने अपनी रचनाओं में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन बहुत ही मनमोहक किया है।

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