बीज के प्रकार |

बीज | बीज की संरचना | बीज के प्रकार |

बीज

बीज स्पमेटोफाइट (जिम्मोस्पर्म व एंजियोस्पर्म) की विशेषता है। बीज में सम्पूर्ण पादप निहित होता है। आवृतबीजी पादपों में निषेचन के पश्चात्‌ अण्ड कोशिका भ्रूण में, अण्डाशय फल में तथा बीजाण्ड बींज में रूपांतरित हो जाते हैं।

बीज की संरचना

आकारिकी की दृष्टि से एक परिपक्व या निषेचित बीजाण्ड बीज कहलाता है। दूसरे शब्दों में परिपक्व अध्यावरण युक्त, गुरूबीजाणुधानी, बीज है। बीज एक प्रसुप्त संरचना है जिसमें शामिल हे बीज आवरण (रक्षात्मक आवरण), संग्रहित भोजन (बीजपत्र) और भ्रूण।

बीज आवरण

  • बीज के बाह्म सुरक्षातमक आवरण को बीजावरण कहते हैं जो अध्यावरण से विकसित होता है।
  • बीजों, जो बाइटेग्मिक बीजाण्ड से विकसित होते हैं, के बीजावरण में दो स्पष्ट स्तर उपस्थित होते हैं-बाह्य परत मोटी, कठोर तथा चर्मिल प्रकार की होती है जिसे बाह्य चोल कहते हैं (यह बाह्य अध्यावरण से विकसित होती है)। जबकि आंतरिक परत पतली . झिल्लीयुक्त होती है। अन्त: चोल कहलाती है (यह अन्तःआवरण से विकसित होती है)। बीज जो कि यूनीटेग्मिक बीजाण्ड से विकसित होते हैं उनमें एक स्तरीय बीज आवरण होता है। बीजावरण प्राय: सुरक्षात्मक कार्य सम्पन्न करता है।
  • बीज पेरीकार्प या फलभित्ति से एक वृन्त के द्वारा जुड़ा रहता है जिसे बीज वृन्त कहते हें।
  • बीज वृन्त (बीजाण्ड वृन्त) परिपक्व बीजाण्ड के शरीर से एक बिः पर जुड़ा होता है, जो नाभिका (पराण्णा) कहलाता है
  • नाभिका के पास एक छोटा सा छिद्र उपस्थित होता है जिसे बोजाण्ड द्वार कहते हैं, जो बीज के भीतर जल के प्रवेश का रास्ता है। एंजियोस्पर्म में अधिकांश बीजाण्ड प्रतीप प्रकार के होते हैं जिनमें बीजाण्ड वृन्‍्त की अतिवृद्धि उपस्थित होती है, जिससे रैफे बनता है।

कीट परागण | निषेचन | युग्मक संलयन |

बीजपत्र

  • “भ्रूण का बीजपत्र सरल संरचना है जो सामान्यतः मोटी ओर संग्राहित भोजन पदार्थों की वजह से फूली हुई होती है (जैसे फल॑ में)। कुछ बीजों में (मटर कुलीय), संचित खाद्य पदार्थ बीजप्नों में संग्रहित होते हैं, जबकि अन्य बीजों में विशेष प्रकाः का पोषक ऊतक होता है जिसे भ्रूणपोष कहते हैं। – बीजों में यह संचित खाद्य पदार्थ कार्बोहाइड्रेट (गेहूं व चावल) अथवा प्रोटीन्‍स (मटर कुलीय) -अथवा वसा (अरण्डी, मूंगफली, सूरजमुखी आदि) हो सकते हैं।

 

  • कभी-कभी कुछ पादपों के बीजों में बीजाण्डकाय का कुछ भाग शेष रह जाता है जो भ्रूणपोष के बाहर एक पतली परत के रूप में उपस्थित होता है जिसे परिभ्रूणपोष कहते हैं। उदाहरण – पान, सुपारी तथा काली मिर्च, अरण्डी।
  • एकबीजपत्रीय भ्रूण में एकल बीजपत्र को वरूथिका कहते हैं। वरूथिका की दूसरी तरफ कुछ घास-गेहूं में दूसरे बीजपत्र का कुछ शेष भाग जीभ के आकार की अतिवृद्धि के रूप में उपस्थिति होता है जिसे एपिब्लास्ट कहते हैं।
  • द्विबीजपत्री के ऐल्बुमिनस बीजों जेसे अरण्डी के बीज में विशेष प्रकार की अतिवृद्धि को केरन्कल या स्ट्रोफियोल कहते हैं जो बीजाण्डद्वार के ऊपर उपस्थित होती है। केरन्कल स्पंजी तथा आर्द्रताग्राही होता है जो अंकुरण के दौरान जल अवशोषण में सहायता करता है।

भ्रूण

  • बीज का सबसे महत्वपूर्ण भाग भ्रूण है जो भविष्य के सबसे छोटे पादप को प्रदर्शित करता है। भ्रूण की उत्पत्ति निषेचित अण्ड कोशिका (युग्मनज) से होती है। भ्रूण में एक भ्रूणीय अक्ष या मुख्य भ्रूणीय अक्ष होता है जिसको टिगेलम कहते हैं जिससे एक या दो बीजपत्र (उस आधार पर कि बीज एकबीजपत्री है या दोबीजपत्री) जुडे रहते हैं। भ्रूणीय अक्ष का वह भाग जो बीजपत्र के जुड़ने के बिन्दु से नीचे होता है, बीजपत्राधार कहलाता है। इसके शीर्ष पर मूलांकुर स्थित होता है। इसी प्रकार भ्रूणीय अक्ष का वह भाग जो बीजपत्र के जुडने वाले बिन्दु के ऊपर तथा जिसके शीर्ष पर प्रांकुर स्थित होता है बीजपत्रोपरिक कहलाता है।

बीज के प्रकार

  • श्रूणपोष की उपस्थिति और अनुपस्थिति के आधार पर बीज दो प्रकार के होते हैंभ्रूणपोषी या एल्बुमिसस बीज और अभ्रूणपोषी या गेर-एल्बुमिनस बीज।

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भ्रृणपोषी या एल्बुमिनस बीज

  • इन बाजों में भ्रूणपोष में भोजन को संग्रहित किया जाता है।
  • इन बोजों में भ्रूणपोष ऊतक अंकुरण के समय उपयोग में लाया जाता है और उनके बीजपत्र पतले व झिल्लीदार होते हैं। उदाहरण एकबीजपत्री पादपों के बीज (गेहूं, चावल और मक्का) आदि। अरण्डी के बीज भी भ्रूणपोषी होते हें।

अभ्रूणपोषी या गैर-एल्बुमिनस 

  • इन बीजों में परिपक्व अवस्था में भ्रूणणपोष अनुपस्थित होता है तथा अभ्रुणपोषी या गैर-एल्बुमिनस बीज कहलाते हें।
  • इन बीजों में भ्रूणपोष ऊतक, भ्रूण के विकास के दौरान ही अवशोषित कर लिया जाता है। भ्रूणपोष से अवशोषित किया गया पदार्थ (खाद्य) बीजपत्रों में एकत्रित कर लिया जाता है जिससे बीजपत्र मोटे एवं मांसल हो जाते हैं जैसे कैप्सेला में तथा सभी द्विबीजपत्रियों में लेकिन अरण्डी के बीज श्रूणपोषी होते हैं।

बीज का अंकुरण

  • बीज एक निषेचित और पका हुआ बीजांड है जो प्रसुप्त भ्रूण, अपने विकास के लिए संग्रहित भोजन’ और रक्षात्मक आवरण को धारण करता है।
  • बीज के प्रसुप्त भ्रूण से बनने वाली नवोद्भिद्‌ जो उसके क्रियाशील वृद्धि को पुर्नग्रहण करने के बाद बनती है, का बनना अंकुरण कहते हैं।
  • प्रसुप्ति की सबसे लम्बी अवधि ल्यूपाइन, ल्युपिनस आकटीकस तथा खजूर, फोयेनिक्स डैक्टीलीफेरा में रिकार्ड की गई है। अंकुरित बीजों में श्वसन की दर बढ़ी हुई होती है।
  • बीजपत्र के व्यवहार के आधार पर अंकुरण मुख्यतः दो प्रकार का होता है (उपरिभूमिक ओर अधोभूमिक) परन्तु सजीवप्रजक अंकुरण भी पाया जाता है।

उपरिभूमिक अथवा भूम्युपरिक अंकुरण

  • इस प्रकार के अंकुरण में बीजपत्राधार की वृद्धि के कारण बीजपत्र भूमि के ऊपर आ जाते हैं। इसे उपरिभूमिक अंकुरण कहते हैं।
  • इस प्रकार का अंकुरण कपास, पपीता, अरण्डी, प्याज, खीरा, इमली, सरसों आदि में घटित होता है। बहुत सी अवस्था में बीजपत्र भूमि से ऊपर आने के बाद हरी पत्ती के रूप में हो जाता है और भोजन निर्माण का कार्य आरम्भ कर देता है, जब तक कि पहली पत्ती इस कार्य का भार न ग्रहण कर ले,. उदाहरण-अरण्डी, कपास, प्याज, पपीता आदि। कुछ दूसरे पादपों में बीजपत्र पत्ते की तरह आकार नहीं अपनाता हे और गिर जाता है (उदाहरण-सेम और इमली)।

अथोभूमिक अंकुरण

  • बीजपत्रोपरिक ;  के लम्बे होने के दौरान प्रांकुर  से बाहर आ जाता है परन्तु यह बीजपत्रों को मिट्टी से बाहर नहीं आने देता है। इसे अधोभूमिक अंक्ुरण कहते है।
  • इस प्रकार का अंकुरण अधिकांश: एकबीजपत्री और कुछ द्विबीजपत्री में घटित होता हे। उदाहरण-मक्का, चावल, गेहूं, नारियल, चना, मटर, आम आदि।

सजोव प्रजकता

स़रजोवप्रजकता एक विशेष प्रकार का बीजांकरण है जो मेंग्रोव वनस्पति की विशेषता है जो कीचड़ युक्त लवणीय दल-दल भूमि में पायी जाती है। उदाहरणराइजोफोण, एवीसीनिया, सीरियोप्स, ब्रीग्यूय व सोनेरेशिया आदि। इन पादपों के भ्रूण में सुप्तावस्था नहीं होती हे तथा बीजों का अंकुरण फल के भीतर ही हो जाता है जब ये मातृ पादप से जुड़े रहते हें। इस प्रकार के अंकुरण को स्वःस्थाने अंकुरण कहते हैं। अंकुरित बीज फल के साथ मातृ पादप से अलग होकर दलदल में गिरकर मूलांकुर के आधार से विकसित पार्श्व मूल के द्वारा स्थापित हो जाता है। इसे सजीव प्रजक अंकुरण  अथवा सजीव प्रजकता कहते हैं।

बीजों की प्रसुप्ति

बीजों में प्रसुप्ति  का होना उनका सबसे प्रमुख गुण है। इसी गुण के कारण बीज वर्षों तक जननक्षम रह सकते हैं। बीजों का प्रकीर्णन जल, वायु अथवा कीटें द्वारा दूर-दूर तक हो जाता हे। अधिकांशत: बीज प्रकीर्णित होते हुए भी अंकुरित नहीं होते हैं। अपितु कुछ समय बाद अंकुरित होते हैं।

परिपक्व होने से अंकुरित होने तक का जो समय होता है उसे बीजों का प्रसुप्ति काल कहते हैं। जब बीज आंतरिक कारणों से अनूकूल वातावरण में भी अंकुरित नहीं हो पाते तो इसे प्रसुप्ति कहते हैं। बीज की प्रसुप्ति पौधों को प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने में सहायक होती है। प्रसुप्ति काल में भ्रूण निष्क्रिय रहता है ओर सभी वृद्धि की प्रक्रियाएं अस्थायी रूप से निष्क्रिय हो जाती हैं।

बीजों में प्रसुप्ति के मुख्य कारण

  • बीजावरण की अपारगम्यता – लेग्यूमीनोसी तथा कोनवोलवूलेसी कुल की कई प्रजातियों के बीजों के बीजावरण उनके परिपक्वता के समय में नमी (जल) एवं ऑक्सीजन के लिए पूर्णतया अपारगम्य होते हैं। ये बीजावरण कठोर व मोटे होते हैं। इनकी भित्ति पर लिग्निन की जलरोधी परत होती है। ऐसे बीजों में अंकुरण बहुत विलम्ब से होता है।
  • ऐसे बीजों की प्रसुप्ति को भिन्‍न भिन्न कृत्रिम साधनों से समाप्त किया जाता है, जैसे –
    • बीजावरण में नुकीले उपकरण द्वारा छोटे-छोटे छिद्र किये जाते हैं ताकि जल व वायु भ्रूण तक पहुंच सके।
    • बीजों को कठोर वस्तु पर रगड़कर बीजावरण को पतला कर दिया जाता हे।
    • थीजावरण पर सल्फ्यूरिक अम्ल की अभिक्रिया से बीजावरण का आशिक क्षय किया जाता है।
    • प्राकृतिक अवस्था में बीजों की प्रसुप्ति को भूमि के जीवाणुओं द्वारा, फल खाने खाले पक्षियों की आंतनाल और अत्यधिक शीत था ताप द्वारा कम किया जा सकता है।

गुरुबीजाणु जनन | megaspore reproduction | भ्रूणकोष

 

प्रसुप्त भूण

    • कुछ जातियों में जब बीज पक जाता है तब भी भ्रूण संपूर्ण तरीके से परिपक्व नहीं होता बल्कि अनुकूल परिस्थितियों के होने पर भी ओर बीजावरण को हटा देने पर भी भ्रूण का अंकुरण नहीं होता। इसे भ्रूण प्रसप्तता कहते हैं।
    • बनों में पाये जाने वाले वृक्षों के फलों के बीजों में प्रायः भ्रूण प्रसुप्तता मिलती है। यह अवस्था बीज की शरीर क्रियात्मक क्रियाओं के कारण होती है। ऐसे बीजों में अंकुरण से पूर्व कई जटिल एंजाइमों और रासायनिक क्रियाओं का पूर्ण होना आवश्यक होता है, जिनके न होने पर भ्रूण अंकुरित नहीं होता। इसलिए ऐसे बीजों को निम्न ताप तथा उपयुक्त नमी में रखकर अंकुरित किया जा सकता है।
    • सेब, नाशपाती, आड, मेपल व चीड आदि के अंकरण में निम्न ताप एक प्रमुख कारण है।

अंकुरण अवरोधक

  • कछ बीजों में विशेष प्रकार के रासायनिक योगिक मिलते हैं जो अंकुरण को रोकते हैं इन्हें अंकुरण अवरोधक कहते हें। जैसे टमाटर में फेरूलिक अम्ल, कोमेरिन, एब्सिसिक अम्ल, डोर्मिन तथा पेरा एस्कोर्बिक अम्ल आदि बीजों के अंकुरण को रोकते हैं।
  • यह अवस्था मरूस्थलीय पादपों के बीजों में पायी जाती है। ये अंक्रण अवरोधक, जल में धुलकर निकल जाते हैं, इसे निक्षाल कहते हें।

फल का बनना

  • फल वह निषेचित अंडाशय है जिसमें बीज के साथ या बीज के बिना कुछ सहायक संरचनाएँ भी होती हैं जो उनसे घनिष्ठता से जुडी होती हैं
  • फलों का अध्ययन पोमोलौजी कहलाता है।
  • फलों के बनने के आधार पर ये’विभाजित होते हैसत्य और असत्य फलों में।
  • केवल अंडाशय से बनने वाले फलों को, जिसमें कोई दूसरा पुष्पीय भाग उसके विकास में भाग नहीं लेता है, सत्य फल कहते है
  • वह फल जिसके विकास में अंडाशय के साथ-साथ दूसरे पुष्पीय भाग भी भाग लेते हैं, उसे असत्य फल कहते हैं। उदाहरण-समस्त संयुक्त फल।
  • वह फल जो बिना निषेचन के बनता है, अत: उसमें बीज नहीं होता, बीजरहित फल और-अनिषेक जनित फल कहलाते हैं। उदाहरण-केला, अमरूद, सेब आदि।

असंगजनन, अनिषेकफलन और बहुभ्रूणता

  • असंगजनन अलैंगिक जनन का एक संशोधित प्रकार है, जिसमें बीज युग्मकों के संलयन के बिना बनते हैं। इसमें वह क्रियां सम्मलित है जहाँ बीजांड काय की द्विगुणित कोशिका श्रूण में विकसित होते हुए, एक ट्विगुणित बीज का निर्माण करती है जिसका आनुवांशिक संघटन जनकों से मेल खाता है।
  • असंगजनन सामान्यतः बहुगुणिता से संबंधित होता है। प्राणि जो असंगजनन के द्वारा जन्म लेता है उसे असंगजनिक कहते है। उदाहरण-डेन्डलियोन्स, सिट्रस, और कुछ घासें। .
  • अनिषेकफलन अनिषेचित अण्डाशय -में विकसित होने वाला फल है जिसके परिणामस्वरूप बीजरहित फल बनता है। यह प्राकृतिक तौर पर अनानास, अंगूर, सेब, नाशपाती और केले की कुछ आवश्यक जातियों में घटित होता है।
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  • बीज में एक से अधिक भ्रूण की उपस्थिति को बहुभ्रृणता कहते है। बहुभ्रूणता सिट्रस के बीज में ल्यूहवेनहॉक द्वारा देखी गई। यह या तो भ्रुणकोष में एक से अधिक अण्डकोशिका की उपस्थिति के कारण होता है या बीजाण्ड में एक से अधिक भ्रूणकोष के होने से ओर सभी अण्ड कोशिकौएँ निषेचित हो जाती हैं।
  • बहुभ्रूणता जिम्नोस्पर्मस में सामान्यता: पायी जाती है लेकिन यह कुछ आवृतबीजी पादपों जैसे संतरा, नींबू और निकोशिआना आदि में भी पायी जाती है।
  • अगर बहुभ्रृणता प्राकृतक तौर पर विकसित होती है तो उसे प्राकृतिक /अनायास बहुभ्रृणता कहते है, और अगर वह कृत्रिम तरीके से विकसित होती हैं तो उसे उत्प्रेरित बहुभ्रूणता कहते है। बीजाण्ड में जब बहुत सारे भ्रण अलग-अलग भ्रूणकोष (एक से ज्यादा) के द्वारा बनते हैं तो उन्हें असत्य या स्यूडो बहुभ्रूणता कहते है। जब बहुत सारे भ्रूण बीज के एक अकेले भ्रुणकोष में बनते है तो उसे सत्य बहुभ्रूणता कहते है। ये विकसित होते हैं

 

  • युग्मनज के विदलन या मुकुलन : उदाहरण-सिमबीडियम, एक्सोकार्पस, निकोशिआना, ऑर्किड आदि। (0) सहाय कोशिका के निषेच्न द्वारा : उदाहरणएनीमोन, एरिस्टोलोकिया, सैजीटैरिया आदि। ह (7) प्रतिरूपी कोशिकाओं के निषेचन द्वारा : उदाहरणपासपालम, – अल्मस आदि।

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