जन्मजात बीमारियाँ | जनन स्वास्थ्य-समस्याएं एवं योजनाएं

जनन स्वास्थ्य

  • विश्व स्थास्थ्य संगठन (डब्ल्यू एच, ओ.) के अनुसार जनन स्वास्थ्य का अर्थ-जनन के सभी पहलुओं सहित एक संपूर्ण स्वास्थ्य अर्थात्‌ शारीरिक, भावनात्मक, व्यवहारात्मक तथा सामाजिक स्वास्थ्य है।
  • इसका संबंध उन बीमारियों, विकारों तथा स्थितियों से है जो जीवन के सभी चरणों के दौरान पुरुष तथा स्त्री के प्रजनन तंत्र की क्रियाविधि को प्रभावित करते हैं।

कीट परागण | निषेचन | भ्रूणपोष का परिवर्धन | युग्मक संलयन

  • अच्छा प्रजनन स्वास्थ्य का अभिप्राय यह है कि लोगों में प्रजनन की क्षमता है, संतोषजनक एवं सुरक्षित यौन जीवन है तथा यह निर्णय करने की स्वतंत्रता है कि कब तथा कितनी बार इस प्रकार प्रक्रिया को अपना सकते हैं।

जनन स्वास्थ्य-समस्याएं एवं योजनाएं

  • डब्ल्यू एच, ओ, की रिपोर्ट के अनुसार वेश्विक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं में से, प्रजनन एवं यौन विकार में से 20% स्त्रियाँ तथा 14% पुरुष विकार ग्रस्त हैं।
  • प्रजनन संबंधी विकार-जन्मजात दोष, विकासात्मक विकार, निम्न जन्म भार, समय पूर्व जन्म, कम प्रजनन क्षमता, नपुंसकता तथा मासिकधर्म संबंधी विकार इत्यादि हैं।
  • शोधों से यह ज्ञात हुआ है कि पर्यावरण प्रदूषकों के संपर्क में आने से प्रजनन स्वास्थ्य को खतरा हो सकता है जैसे –
    • 11सीसा के संपर्क में आने से पुरुष तथा स्त्री दोनों में ही प्रजनन क्षमता घटती है। पारे के संपर्क में आने से जन्मजात दोष तथा तंत्रिका संबंधी विकार प्रकट होते हैं।

 

      • कई साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि अंतःस्रावी अवरोधकों (रसायन जो मनुष्य तथा जंतुओं में हामोन संबंधी गतिविधि में बाधा उत्पन्न करते हैं) के संपर्क में आने के परिणामस्वरूप प्रजनन क्षमता, गर्भावस्‍था तथा प्रजनन के अन्य पहलुओं में विकार हो सकता है।
  • विश्व में भारत ही पहला ऐसा देश था जिसने “परिवार नियोजन’ कार्यक्रम की शुरूआत 1951 में की, जिसका पिछले दशकों में समय-समय पर इनका आवधिक मूल्यांकन भी किया गया।
  • समाज में जनन स्वास्थ्य सामान्य स्वास्थ्य का एक निर्णायक भाग अनाता है। कुछ निर्णायक महत्व इस प्रकार से है-
    • गर्भावस्‍था में समस्याएं, शिशुजन्म और असुरक्षित गर्भपात।
    • युवाओं (15-24 वर्ष) में लैंगिक संचारित॑ रोगों सम्मलित) की अत्यधिक संक्रमणित दर कम उम्र की माताओं में जल्दी ही गर्भावस्‍था और शिशुजन्म के कारण होने वाली अल्प शिक्षा और निम्न भाविक बेतन।

 

  • जनन संबंधित ओर आवधिक क्षेत्रों को इसमें सम्मिलित करते हुए बहुत उन्नत व व्यापक कार्यक्रम फिलहाल “जनन एवं बाल स्वास्थ्य सेवा कार्यक्रम ( आर सी एच )’ के नाम से प्रसिद्ध है।
  • प्रजनन एवं बाल स्वास्थ्य (२N) कार्यक्रम अक्टूबर 1997 में शुरू किया गया था।
  • RCHकार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिशु, बाल एवं मातृ मृत्यु दर को कम करना है।
  • जीवन की परिपक्व अवस्था में, युवा लोगों का स्वास्थ्य, शिक्षा, शादी और गर्भ तथा प्रसवकाल, समाज के जनन स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण गुण हैं।

जनन स्वास्थ्य कार्यक्रम

  • दोनों ही नर (पुरुषों) और महिलाओं में जनन के संदर्भ में विभिन्‍न जनन संबंधित धारणाएँ श्रव्य-दृश्य और छपाई के माध्यम से जागरुकता उत्पन्न करता हे।
  • स्कालों में लिंग शिक्षा देकर स्कूल जाने वाले युवाओं को लिंग से सम्बंधित परिणामों की कल्पित कथाओं और गलतफहमी से बचाता है।
  • जननीय अंगों, किशोरावस्था और सुरक्षित एवं स्वच्छ लैंगिक तरीकों की सही जानकारी देता है।
  • फर्टाइल दम्पत्तियों और जो विवाह लायक उम्र में हैं, उनको जन्म को नियन्त्रण करने वाले तरीकों के बारे में, प्री-नेटल ओर पोस्ट नेटल माँ और बच्चों की देखभाल करने के बारे में शिक्षित करता है।

एम्निओसेन्टेसिस

  • एम्निओसेन्टेसिस जन्मपूर्व रोग लक्षण सम्बन्धी निदान की तकनीक है जो निम्न को निर्धारित करने की तकनीक है –
    • विकसित हो रहे बच्चे का लिंग निर्धारित करना।
    • जन्मजात बीमारियों का आनुवांशिकीय नियंत्रण ।
    • श्रूण में उपापचयी विकृति का पता करना।
  • यह सामान्तयता गर्भावस्‍था के 15-20 सप्ताह के दौरान किया जाता है।

 

एम्निओसेन्टेसिस की प्रक्रिया में निम्नलिखित पद होते हैं –

    • भ्रूण की एक्सीडेन्टल क्षति को रोकने के लिये सौनोग्राफी तकनीक (उच्च आवृत्ति की अल्ट्रासाउन्ड तरंगों के उपयोग द्वारा) के द्वारा भ्रूण की स्थिति को निर्धारित किया जाता है।
    • एक पतली खोखली सुई को गर्भवती महिला (गर्भधारण के बाद लगभग 14 वें या 16 वे सप्ताह में) की उदरीय एवं गर्भाशीय दीवार से होकर एम्निओटिक गुहा में प्रवेश कराया जाता है।
    • एम्निओटिक द्रव को कम मात्रा में बाहर निकाला जाता है जिसमें कि भ्रूण की त्वचीय कोशिकाऐं एवं कई प्रोटीन्‍्स मुख्यतः एन्जाइम उपस्थित होते हैं। अब इन कोशिकाओं को बाहर संवर्धित कर आगे का परीक्षण किया जा सकता है।

एम्निओसेन्टेसिस के महत्व

लिंग निर्धारण

  • भ्रूणीय त्वचा की कायिक कोशिकाएऐं, जो कि एम्निओटिक द्रव के साथ बाहर निकाली जाती हैं, को स्टेन करके लिंग गुणसूत्रों (बार बॉडी) की उपस्थिति के द्वारा लिंग का निर्धारण किया जाता है।
  • विकसित हो रहे भ्रूण में बार बॉडी की उपस्थिति से संकेत मिलता है कि भ्रूण मादा है क्योंकि मादा में 2X गुणसूत्र होते हैं जिसमें से एक X-गुणसूत्र क्रियाशील होता है जबकि दूसरा X-गुणसूत्र गहरी रंजक बार बॉडी में हेटरोक्रोमेटाइज्ड हो जाता है।

जन्मजात बीमारियाँ

  • कायिकी कोशिकाओं के केरियोटाइप के अध्ययन द्वारा गुणसूत्रों की संख्या में परिवर्तन से हुई विकृतियां जैसे – डाउन सिन्ड्रोम, टर्नर सिन्ड्रोम, क्लाइनफेल्टर सिन्ड्रोम इत्यादि का पता लगाया जा सकता है।

जनन स्वास्थ्य-समस्याएं एवं योजनाएं

उपापचयी विकृति

  • एम्निओटिक द्रव के एन्जाइम विश्लेषण द्वारा विभिन्नि प्रकार की जन्मजात उपापचयी विकृतियां जैसेफिनॉयलकीटोन्यूरिया, एल्केप्टोनूरिया इत्यादि का पता लगाया जा सकता है।
  • ये जन्मजात विकृतियाँ जीन उत्परिवर्तन के कारण विशिष्ट एन्‍्जाइम की , अक्रियता या अनुपस्थिति के परिणामस्वरूप होती हैं। अत: एम्निओसेन्टेसिस की सहायता से यदि यह निश्चित हो जाये कि बच्चा ठीक न हो सकने वाली जन्मजात बीमारियों से ग्रसित है तो माता गर्भपात करा सकती है।

पादप वृद्धि एवं परिवर्धन | biology notes in hindi

दोष

  • यद्यपि इन दिनों, एम्निओसेन्टेसिस का दुरूपयोग भी शुरू हो गया है। माताओं को यदि यह पता लग जाये कि भ्रूण लड़की हे तो वे सामान्य रूप से विकसित हो रहे भ्रूण का भी गर्भपात करवा देती हें। इस प्रकार यह एक सामान्य बच्चे को मार देने के समान है। इसलिये भारत सरकार ने जन्मपूर्व लैंगिक लक्षणों का पता कर निदान करवाने वाली तकनीकों से सम्बन्धित (दुरूपयोग का नियंत्रण एवं रोक) अधिनियम 1994, 1 जनवरी 1994 से क्रियान्वित किया है जिसके अन्तर्गत आनुवांशिक सलाह केन्द्र एवं प्रयोगशालाएं खोलने के लिये रजिस्ट्रेश करवाना आवश्यक है। इस अधिनियम का उल्लंघन करने वाले पर 50,000 रूपये जुर्माना एवं दो वर्ष की जेल हो सकती है।
  • किसी व्यक्ति द्वारा डॉक्टर की शिकायत करने पर उसका रजिस्ट्रेशन भी रद्द किया जा सकता है।

जनसंख्या विस्फोट और जन्म नियंत्रण

  • जनसंख्या विस्फोट कम समय में मानवीय जनसंख्या के आकार में तेजी से बढ़ोत्तरी को मानवीय जनसंख्या विस्फोट कहते हैं।
  • जनसंख्या की वृद्धि दर कुछ तत्वों पर निर्भर करती हैं जैसेउर्वरता, जन्म दर , मृत्यु दर , प्रवास उम्र और लिंग संरचना।

 

जनसंख्या विस्फोट के कारण

  • मृत्यु दर में कमी
  • खादय उत्पादन में वृद्धि
  • सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं चिकित्सीय सुविधा में सुधार
  • प्रजनन आयु वाले लोगों की संख्या में वृद्धि
  • शिशु की मृत्यु दर तथा मातृ मृत्यु दर में कमी।

जनसंख्या विस्फोट के प्रभाव

  • अधिक जनसंख्या बेरोजगारी
  • निर्धनता
  • निरक्षरता
  • खराब स्वास्थ्य
  • प्रदूषण एवं वैश्विक उष्मन

जनसंछ्या विस्फोट को नियंत्रित करने के तरीके

  • विवाह योग्य आयु को बढ़ाकर पुरुष के लिए 21 वर्ष तथा स्त्री के लिए 18 वर्ष करना
  • जनम नियंत्रण विधि का उपयोग करना: गर्भनिरोधक विधियों के प्रयोग द्वारा छोटे परिवार की अवधारणा हेतु प्रोत्साहित करना।

जन्म नियंत्रण

  • अवरोधित तरीकों और यत्त्रों से गर्भधारण को नियंत्रण करना और उससे सनन्‍्तति को सीमित करना जन्म नियंत्रण कहलाता हे।
  • जन्म को नियंत्रण करने वाला तरीका या विधि जो जानबूझ कर निषेचन को रोकती है उसे गर्भनिरोधन कहते हैं
  • एक आदर्श गर्भ निरोधक प्रयोगकर्ता के हितों की रक्षा करने वाला, आसानी से उपलब्ध, प्रभावी तथा जिसका कोई अनुषंगी प्रभाव या : दुष्प्रभाव नहीं हो या हो भी तो कम से कम। साथ ही यह उपयोगकर्ता की कामेच्छा, प्रेरणा तथा मैथुन में बाधक ना हो।
  • गर्भनिरोधक तरीके अवरोधित तरीके होते हैं और दो प्रकार के होते हैंअस्थायी ओर स्थायी। * अस्थायी विधियों में शामिल होते हैंप्राकृतिक विधियाँ, रासायनिक विधियाँ, यान्त्रिकी तरीके और दैहिकी यंत्र या हॉमोनल विधियाँ और स्थायी विधियों में शामिल हे बन्धकरण

बीज | बीज की संरचना | बीजपत्र | भ्रूण |

अस्थायी विधियों

  • प्राकृतिक विधियाँ प्राकृतिक या परंपरागत विधियाँ अण्डाणु एवं. शुक्राणु के संगम को रोकने के सिद्धांत पर कार्य करती हैं। इसमें शामिल है सुरक्षित महीना आवधिक संयम बाह्य स्खलन या अंतरित मैथुन, और स्तनपान अनार्तव।
  • आर्तव के एक हफ्ते पहले और एक हफ्ते बाद को लैंगिक समागम के लिए सुरक्षित महीना कहा जाता है। यह तरीका निम्न तत्वों पर आधारित है
  • मासिकस्राव के 14वें दिन में घटित होने वाले अण्डोत्सर्ग के कारण – अण्डाणु केवल दो दिनों के लिए जीवित रहता है। – शुक्राणु केवल तीन दिनों के लिए जीवित रहता है।
  • इनमें से एक उपाय आवधिक संयम है जिसमें एक दंपति माहवारी चक्र के 10वें से 17वें दिन के बीच की अवधि, के दौरान मैथुन से बचते हैं जिसे अंडोत्सर्जन की अपेक्षित अवधि मानते हैं। इस अवधि के दौरान निषेचन एवं उर्वर (गर्भधारण) के अवसर बहुत अधिक होने के कारण इसे निषेच्य अवधि भी कहा जाता है। इस तरह से, इस दौरान मैथुन सहवास) न करने पर गर्भाधान से बचा जा सकता हे।

 

  • बाह्य स्खलन या अंतरित मैथुन (सबसे पुराना तरीका) एक अन्य विधि है जिसमें पुरुष साथी संभोग के दौरान वीर्य स्खलन से ठीक पहले स्‍त्री की योनि से अपना लिंग बाहर निकाल कर वीर्यसेचन से बच सकता है। इस विधि में कुछ कमियाँ भी है जैसे पुरुष काओपरस ग्रन्थि से कुछ स्निग्ध द्रव का उत्पादन स्खलन से पहले करता है जिसमें कुछ शुक्राणु भी होते हैं।
  • स्तनपान अनार्तव (मासिक स्राव की अनुपस्थिति) विधि भी इस तथ्य पर निर्भर करती है कि प्रसव के बाद, स्त्री द्वारा शिशु को भरपूर स्तनपान कराने के दौरान अंडोत्सर्ग और आर्तव चक्र शुरू नहीं होता है। इसलिए जितने दिनों तक माता शिशु को पूर्णतः स्तनपान कराना जारी रखती है गर्भधारण के अवसर लगभग शून्य होते हैं। यह विर्धि प्रसव के बाद 6 माह की अवधि तक प्रभावी होती है।
  • स्तनपान से मासिक स्राव में कमी आती है ऐसा डिंबोत्सर्जन को प्रेरित करने वाले हार्मोन के अवमुक्त होने की प्रक्रिया में बाधा पहुँचने के कारण होता है। प्रोलेक्टिन तथा ऑक्सिटोसिन के द्वारा स्तन द्वारा दुग्ध पआ्राव की प्रक्रिया नियंत्रित होती है।
  • लैक्टेशनल एमेनोरिया विधि का गर्भनिरोधक प्रभाव प्रोलैक्टिन के स्तर में वृद्धि के कारण होता है।

निषेचन एवं भ्रूण विकास

  • जब प्रोलेक्टिन का स्तर बढ़ता है तो गोनैडोट्रॉफिन को अवमुक्त करने बाला हार्मोन बाधित हो जाता है। जब गोनेडोट्रॉफिन को अवमुक्त करने वाले हार्मोन का स्तर कम हो जाता है तो स्त्री का शरीर भी एस्ट्रोजन की मात्रा को कम कर देता है। एस्ट्रोजन के स्तर में वृद्धि के बिना डिम्बोत्सर्जन नहीं हो सकता है। यदि स्त्री डिम्बोत्सर्ग नहीं करती है तो गर्भावस्‍था बाधित हो जाती है।

Leave a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!