Friday, December 9, 2022
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लैंगिक जनन | निषेचन-पूर्व घटनाएँ | BIOLOGY CLASS 12

लैंगिक जनन

  • लैंगिक जनन में निषेचन की प्रक्रिया द्वारा नर और मादा युग्मकों का संलयन शामिल हेै।
  • ये युग्मक एक ही व्यक्ति द्वारा या विपरीत लिंग के अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा बनाएं जाते हैं।
  • लैंगिक जनन के परिणामस्वरूप जो संतति उत्पन्न होती है, वह अपने जनकों के अथवा आपस में भी समरूप नहीं होती है।
  • जब सभी जीव अपने जीवन में वृद्धि की एक निश्चित अवस्था एवं परिपक्वता तक पहुँचते हैं तो लैंगिक जनन कर सकते हैं। वृद्धि का यह काल किशोर अवस्था की प्रावस्था कहलाता है। पादपों में यह कायिक प्रावस्था कहलाती है। 
  • इस चरण का अंत प्रजनन चरण की शुरूआत करता है। फूल आने पर उच्च पौधों में प्रजनन चरण देखा जा सकता है। 
  • वार्षिक तथा द्विवार्षिक किस्मों के पादप सभी कायिक, जनन तथा जीर्यमान प्रावस्थाओं को प्रदर्शित करते हैं; परंतु बहुवर्षीय जातियों में इन प्रावस्थाओं को स्पष्ट रूप से पारिभाषित करना कठिन होता है। 
  • कुछ पादप असामान्य रूप से पुष्पीकरण की क्रियाविधि को प्रदर्शित करते हैं, इनमें से कुछ जैसे बांस  की जाति के पादप अपने पूरे जीवन काल में सामान्यतः 50-100 वर्षों के बाद केवल एक बार पुष्प पैदा करते हैं जिसके परिणामस्वरूप एक बड़ी संख्या में फल उत्पन्न होते हैं और मर जाते हैं। एक अन्य पादप, स्ट्रोबिलेन्थस कुम्थिआना 12 वर्षों में एक बार पुष्प उत्पन्न करता है।
  • अधिकतर प्राणियों की किशोरावस्था की समाप्ति उनके प्रजनन व्यवहार के पूर्व उनकी शारीरिकी एवं आकारिकी के बदलाव से प्रकट होती है। जैसे पक्षियों में अंडे देगा और अपरा स्तनधारियों की महिलाओं में अंडाशय की गतिविधियों में चक्रीय परिवर्तन।
  • नॉन-प्राइमेट स्तनधारियों जैसे गाय, भेड़, चूहों, हिरन, कुत्ता, चीता, आदि में जनन के दौरान ऐसे चक्रिय परिवर्तन देखे गए हें जिन्हें मदचक्र (ओएस्ट्रस साइकिल) कहते हैं; जबकि प्राइमेटों (बन्दर, ऐप्स, मनुष्य) में यह ऋतुसत्राव चक्र कहलाता है। 
  • अधिकांश स्तनधारियों, विशेषकर जो प्राकृतिक रूप से वनों में रहते हैं; अपने जनन प्रावस्था के दौरान अनुकूल परिस्थितियों में ऐसे चक्रों का प्रदर्शन करते हैं। इसी कारण इन्हें मौसमी प्रजनक कहते हैं। अधि कांशत: स्तनधारी अपने पूर्ण जनन काल में जनन के लिए सक्रिय होते हैं। इसी कारण इन्हें सतत प्रजनक कहते हैं। 
  • प्रजनन चरण की समाप्ति से शरीर में बुढ़ापा आता है, जिसके दौरान शरीर में होने वाले सहवर्ती परिवर्तन जैसे कि चयापचय की गति धीमी हो जाना अंत में मृत्यु की ओर ले जाता हेै

सेक्सुअल रिप्रोडक्शन में घटनाएँ

  • लेैंगिक प्रजनन में युग्मनज के विघटन के दौरान युग्मक और समसूत्रण के दोरान अर्धसूत्रीविभाजन’ शामिल होता है।
  • लेंगिक जनन तीन अलग अवस्थाओं जेसे-निषेचन-पूर्व, निषेचन तथा निषेचन-पश्चात्‌ में विभकत किया जा सकता है।

निषेचन-पूर्व घटनाएँ

  •  इसके अंतर्गत युग्मकों के संयोजन से पूर्व की सारी घटनाएँ सम्मिलित होती हें। निषेचन पूर्व की दो प्रमुख घटनाएँ-युग्मकजनन ( गैमेटोजेनिसिस ) तथा युग्मक स्थानांतरण ( गैमेटो ट्रांसफर ) हैं।
  • युग्मक जनन युग्मक जनन नर तथा मादा दो प्रकार के युग्मकों की गठन प्रक्रिया को संदर्भित करता है।
  • युग्मक दो प्रकार के होते हैं समयुग्मकी एवं विषमयुग्मक।
  • युग्मक अगुणित कोशिकाएँ होती हैं। कुछ शैवालों में दो युग्मक देखने में एक दूसरे के समान दिखाई पड़ते हैं, इसी कारण वह समयुग्मकी  कहलाते हैं; क्योंकि इनकी एकरूपता के कारण हम इन्हें नर तथा मादा युग्मकों के रूप में श्रेणीबद्ध नहीं कर सकते।
  • अधिकतर Cite प्रजनक जीवों द्वारा आकारिकी रूप से स्पष्ट दो प्रकार के ( विषम युग्मक ) पैदा किए जाते हैं इस प्रकार के जीवों में नर युग्मकों को पुमणु या शुक्राणु कहते हैं; जबकि मादा युग्मकों को अंड कहते है 

types of gamates

Fig. ; Types of gametes: (a) Isogametes of Cladophora (an alga); (b) Heterogametes of Fucus (an alga); (c) Heterogametes of Homo sapiens (Human beings)

  • पादप में नर तथा मादा दोनों जनन संरचनाएँ पाई जाती हैं; परंतु जब एक ही पादप में दोनों नर तथा मादा जनन संरचनाएँ पाई जाती हैं तो वह “द्विलिंगी’ अथवा जब वह भिन्‍न पादपों पर पाई जाती है तो “एक लिंगी’  कहलाता है। 
  • बहुत-से कवक तथा पादपों में द्विलिंगी स्थिति को उल्लिखित करने के लिए उभय लिंगाश्रयी तथा समथैलसी शब्द का प्रयोग करते हें। एकलिंगता की स्थिति को उल्लेखित करने के लिए एकलिंगाश्रयी तथा विषमथेलसी शब्द प्रयुक्त किए जाते हैं।
  • पुष्पीय पादपों में एक लिंगी नर पुष्प पुंकेसरी अर्थात्‌ पुंकेसर ( परागकण ) वहन करने वाला होता है जबकि मादा पुष्प स्त्रीकेसर (915ध1190९) अर्थात्‌ स्त्रीकेसर धारण किए रहती है। 
  • कुछ पुष्पीय पादपों में एक अकेला पादप उभयलिंगाश्रयी (नर या मादा दोनों लिंगी) हो सकता है और इनमें पैदा होने वाले पुष्प एकलिंगी तथा द्विलिंगी दोनों हो सकते हैं; उभयलिंगाश्रयी पादपों के कुछ उदाहरण कुकरबियों तथा नारियल वृक्ष हैं; जबकि पपीता तथा खजूर एकलिंगाश्रयी के उदाहरण हैं। 
  • केंचुए, स्पंज, टेपवर्म तथा जोंक द्विलिंगी प्राणियों के प्रारूपिक उदाहरण हैं, इनमें नर तथा मादा जनन अंग दोनों ही ( उभयलिंगी ) एक प्राणी में पाए जाते हैं। तिलचदूटा एकलिंगी प्राणी का उदाहरण है। 
  • एक गुणित जनक सूत्री विभाजन (समसूत्रण) के द्वारा युग्मक उत्पन्न करते हैं। . बहुत से जीव जिनका संबंध मोनेरा, कवक, शैवाल तथा ब्रायोफाइट से है; वह अगुणित पादप काय होते हैं ओर वे जीव जिनका संबंध टेरीडोफाइटा, जिम्नोस्पर्म, ऐंजिओस्पर्म तथा अधिकांश प्राणी जिनमें मनुष्य भी शामिल है; उनकी जनकीय काय द्विगुणित होती हेै। यह स्पष्ट हो चुका है कि अर्धसूत्री विभाजन जो न्यूनकारी विभाजन है और जहाँ द्विगुणित काय अगुणित युग्मकों को उत्पन्न करता है।

युग्मक स्थानांतरण

  • युग्मक स्थानांतरण लैंगिक प्रजनन के प्रथम चरण की द्वितीय एवं अंतिम घटना होती है। यह एक प्रक्रिया है जिसमें युग्मक संलयन के द्वारा निषेचन क्रिया को सुगम बनाते हैं।
  • कुछ स्थितियों में नर एवं मादा दोनों युग्मक गति करते हुए संलयन हेतु एक दूसरे की ओर आते हैं।
  • सरल पोधों जैसे शैवाल, ब्रायोफाइट्स और टेरिडोफाइट्स में मोटाइल नर युग्मक पानी के माध्यम से स्थिर मादा युग्मक तक पहुँचते हैं। 
  • बीजीय पादपों में, पराग कण नर युग्मकों के वाहक के रूप में कार्य करते हैं तथा अंडप में अंड होता हे। परागकण परागकोश में उत्पन्न होते हैं; अतः निषेचन संपन्न हो; उससे पहले ही यह परागकण वर्तिकाग्र में स्थानांतरित हो जाते हैं। 
  • द्विलिंगियों में स्वतः निषेचणीय पादप जैसे मटर में परागकणों का वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण अपेक्षाकृत सरल होता है; क्योंकि इनमें परागकोष तथा वर्तिकाग्र एक दूसरे के निकट स्थित रहते हैं। परागकण जैसे ही झड़ने लगते हैं; उसके तुरंत बाद ये वर्तिकाग्र के संपर्क में आते हैं। परपरागणित पादपों में (जिसमें एकलिंगाश्रयी पादप शामिल हें) परागण  के द्वारा वर्तिकाग्र पर परागकण्णों का स्थानांतरण सुगमता पूर्वक संपन्न हो जाता है। परागकण वर्तिकाग्र पर अंकुरित होते हैं तथा परागनली नर युग्मकों को अपने साथ लेती हुई अंडप के भीतर प्रवेश कर जाती है। अंड के पास नर युग्मकों को अपने से बाहर निकाल देती है।

 

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